Monday, January 15, 2018

| गले में घंटी का श्रृंगार ||

मैंने सुना है कि एक बहुत बड़ा तार्किक तेल खरीदने गया था तेली के घर। तेली का कोल्हू चल रहा था। बैल कोल्हू खींच रहा था, तेल निचुड़ रहा था। तार्किक था! उसने देखा यह काम, कोई हांक भी नहीं रहा है बैल को, वह अपने आप ही चल रहा है।
उसने पूछा, गजब, यह बैल अपने आप चल रहा है! कोई हांक भी नहीं रहा! रुक क्यों नहीं जाता? उस तेल वाले ने कहा, महानुभाव, जब कभी यह रुकता है, मैं उठकर इसको फिर हांक देता हूं। इसको पता नहीं चल पाता कि हांकने वाला पीछे मौजूद है या नहीं।
तार्किक-तार्किक था। उसने कहा, लेकिन तुम तो बैठे दुकान चला रहे हो, इसको दिखाई नहीं पड़ता? उस तेल वाले ने कहा, जरा गौर से देखें, इसकी आंखों पर पट्टियां बांधी हुई हैं। इसे दिखाई कुछ नहीं पड़ता। जब भी यह जरा ठहरा या रुका कि मैंने हांका। पर उस तार्किक ने कहा कि तुम तो पीठ किये बैठे हो उसकी तरफ। पीछे चल रहा है कोल्हू तुम्हें पता कैसे चलता है? उसने कहा, आप देखते नहीं बैल के गले में घंटी बांधी हुई है? जब तक बजती रहती है, मैं समझता हूं चल रहा है। जब रुक जाती है, उठकर मैं हांक देता हूं। इसको पता नहीं चल पाता। उस तार्किक ने कहा, अब एक सवाल और। क्या यह बैल खड़े होकर गर्दन नहीं हिला सकता है? उस तेल वाले ने कहा, जरा धीरे-धीरे बोलें। कहीं बैल न सुन ले।
तुम जरा अपनी जिंदगी तो गौर से देखो। न कोई हांक रहा है, मगर तुम चले जा रहे हो। आंख बंद है। गले में खुद ही घंटी बांध ली है। वह भी किसी और ने बांधी, ऐसा नहीं। हालांकि तुम कहते यही हो। पति कहता है, पत्नी ने बांध दी। चलना पड़ता है। बेटा कहता है, बाप ने बाध दी है। बाप कहता है, बच्चों ने बांध दी है। कौन किसके लिए घंटी बांध रहा है! कोई किसी के लिए नहीं बाध रहा है। बिना घंटी के तुम्हें ही अच्छा नहीं लगता। तुमने घंटी को श्रृंगार समझा है। आंख पर पट्टियां हैं, घंटी बंधी है, चले जा रहे हो। कहां पहुंचोगे? इतने दिन चले, कहां पहुंचे? मंजिल कुछ तो करीब आई होती....
ओशो

समझने वाला कोई तो मिला

बारिश अब तेज़ हो चुकी थी और उतनी ही तेज़ मीनाक्षी के दिल की धड़कने। वो लगातार ड्राइंग रूम से बालकनी के चक्कर लगाए जा रही थी, उसकी बेचैनी उसकी आंखों के साथ-साथ कदमों से भी साफ झलक रही थी। और ये बेचैन कदम तब रूके जब किचन से आ रही दूध के जलने की गंध मीनाक्षी की नाक तक पहुंची। वो दौड़कर किचन में गई और गैस की नॉब बंद करके उस पर चढ़ा चाय का पतीला नीचे उतारा, चाय के नाम पर अब सिर्फ जली हुई चायपत्ती ही बची थी।
उसी वक्त डोरबेल बजी तो मीनाक्षी सब कुछ वैसा ही छोड़कर दरवाज़ा खोलने चली गई। उसने दरवाज़ा खोला तो सामने समर्थ खड़ा था। सिर ने पैर तक भीगा हुआ, उसने अपने जूते वही बाहर उतारे और अंदर आ गया।
“मेरी पूरी बात सुने बिना तुम कहां चले गए थे?” मीनाक्षी ने अपने पति समर्थ के अंदर आते ही सवाल शुरू कर दिए। पर समर्थ बिना कुछ कहे सीधा बाथरूम में घुस गया। बेचैनी अब मीनाक्षी की आंखों से आंसू बनकर बहने लगी और ये आंसू उसे अपने साथ अतीत के उस किनारे तक ले गए जहां उसका एक ख्वाब टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर गया था।
12 साल की रही होगी मीनाक्षी जब स्कूल में घुंघरूओं और कथक से उसकी पहली जान-पहचान हुई थी लेकिन ये जान-पहचान ज़्यादा लंबी नहीं चली, उसके पिता को जैसे ही उसके कथक सीखने का पता चला उन्होंने उसका स्कूल बदल दिया, और सख़्त हिदायत दी कि अगर उसने फिर से ये नाच-गाना सीखने की कोशिश की तो वो उसका स्कूल जाना ही बंद करवा देंगे। मीनाक्षी के पिता को लड़कियों के नाच-गाने से ऐतराज़ था, पर क्यों? इसकी वजह न तो उन्होंने कभी बताई और न ही मीनाक्षी ने पूछने की हिम्मत की। एक-दो बार मीनाक्षी ने अपने पिता को मनाने की कोशिश की लेकिन....
वक्त बीत गया। मीनाक्षी की समर्थ से शादी को भी दो साल हो गए। लेकिन कथक से लगाव मीनाक्षी के मन के एक कोने में आज भी ज़िंदा था और जब से उसे ये पता चला है कि उसके पड़ोस में एक डांस स्कूल खुला है उसका वो लगाव फुदक कर बाहर आ गया। मीनाक्षी ने सुबह जब समर्थ से कथक सीखने के बारे में बात की तब उसने कोई जवाब नहीं दिया। शाम को जब वो ऑफिस से लौटा तब मीनाक्षी ने एक बार और पूछा तो वो फिर से बिना कुछ कहे बाहर चला गया उसके बाहर जाते ही मीनाक्षी के मन में बेचैनी के बादल घिर आए और बाहर आसमान में घिरे बादल बरसने लगे।
अब मीनाक्षी को यकीन हो गया था कि पिता की तरह उसका पति भी न उसके मन को समझता है, न सपनों को। आंखों से टपकते आंसूओं को पोंछते हुए वो एक बार फिर अपनी ख्वाहिश को मन में दफन करने के लिए तैयार थी...तभी...पीछे से एक आवाज़ सुनाई दी...घुंघरूओं की आवाज़...मीनाक्षी ने पलटकर देखा तो समर्थ हाथ में घुघरूओं की एक जोड़ी लिए उसके पीछे खड़ा था।
“ये लो...अब इसके बिना कथक कैसे सीखती। वैसे तो सुबह ही सोचकर गया था कि शाम को ये घुंघरू लाकर तुम्हें सरप्राइज़ दूंगा पर भूल गया...इसीलिए अभी बिना तुम्हें बताए ये खरीदने चला गया था…सॉरी”
समर्थ बोले जा रहा था और मीनाक्षी ख़ामोश थी। घुंघरू उसके हाथों में थे लेकिन उनका संगीत उसके मन में गूंज रहा था और उस गूंज में उसके तमाम पूर्वाग्रहों का शोर शांत हो चुका था।
कोई तो मिला समझने वाला कोई तो मिला अपना सा।
ज़िन्दगी मेरी गुलज़ार हो गयी लगता है अब सपना सा...

एक टूटा प्याला | Ek toota pyala

ड्राइंगरूम मे किसी चीज़ के टूटने की आवाज़ से रीतू दौड़ कर वहाँ पँहुची पर तब तक रोमा भाभी ने बंटी को एक थप्पड़ जड़ दिया था। माँ को देखते ही बंटी रोते हुए दौड़ कर माँ से चिपट गया। सामने ही कांच का गुलदान ज़मीन पर टुकड़ों मे पड़ा था जो शायद बंटी और राजू के खेलने में मेज़ से गिर गया था।
रोमा पहले तो ननद को देख कर सकपकाई फिर अपने बेटे राजू को जबरन घसीटते हुए बाहर ले जाने लगी। राजू भी रोया तो रीतू ने उसे संभालने की कोशिश की पर रोमा ने उसका हाथ झटक दिया......”रहने दीजिए… ये तो अब आए दिन हुआ करेगा”।
रीतू का दिल धक् से रह गया… भाभी की आवाज़ मे उतरा रूखापन उसे भीतर तक हिला गया..’अभी तो उसे मायके आए एक महीना भी नहीं हुआ… और अभी से…’
उसके ज़हन मे उस दिन का वाकया घूम गया जिस दिन वो यहाँ आई थी। बात छोटी सी थी पर किसी ने नहीं सोचा था कि कुछ ही देर में वह इतना तूल पकड़ लेगी।एक काँच का प्याला ही तो उसके हाथ से गिर कर टूटा था जिस पर उसके पति रवि ने कहा था...
“रीतू सम्भाल कर काम किया करो..यह टी सैट दीदी जापान से लाई थीं”, और वह बिफर उठी थी,
”तो क्या मैंने जानबूझकर तोड़ दिया” और फिर बात इतनी बढ़ी कि यहां तक नौबत आ गई कि रीतू ने अपना सूटकेस पैक कर लिया” मैं तुम्हारे साथ अब एक मिनिट भी और नहीं रह सकती”
“ठीक है, रोकता कौन है तुम्हें...” रवि का जबाब था।
घर पर माँ भाई ने कारण पूछा तो उसका एक ही जबाब था, “मैं उसके साथ नहीं रह सकती”
पर आज….उसका सर घूम गया…’एक प्याले की चटख से वह मायके आ गई पर अब….बंटी के गाल पर पड़ा थप्पड़ ...उसका दिल तड़प कर रह गया। माँ के कभी कहे शब्द उसके कानों में गूंज गए,’ भाई भाभी के घर मे ब्याही बेटी की गुज़र नहीं होती….अपना घर जैसा भी हो अपना ही होता है’ बेटे को कस कर सीने से लगाते हुए उसने रवि को फोन मिला दिया,”मैं घर आना चाहती हूँ”
“तुम्हारा घर है इसमें पूछना क्या।” रवि का जबाब था।
“मुझे माफ कर दो…गलती शायद मेरी ही थी” घर पंहुचते ही बिना किसी लागलपेट के उसने कहा तो रवि ने प्यार से उसके हाथ पकड़ लिए,”गलती मेरी भी थी...एक प्याला मेरे प्यार और परिवार से ज़्यादा तो नहीं था”
“फिर तुम मुझे लेने क्यों नहीं आए?”
“रीतू….तुम्हारे जाते ही मुझे अपनी गलती का अहसास हो गया था पर मैं चाहता था कि तुम्हें भी इस बात का अहसास हो ताकि भविष्य मे हम इतनी छोटी छोटी बातों को तूल न दें। हमारे प्यार से बड़ा कुछ भी नहीं है” रीतू के हाथों को चूम कर उसने बंटी को गोद मे उठा लिया।
एक प्याला टूट कर उन्हें बहुत कुछ सिखा गया था....

Packaged Food Vs Fresh Food | Think

पिछले दिनों Gurgoan जाना हुआ । वहां एक मित्र के घर रुका । उनकी छोटी बहन अमरीका में रहती हैं । छुट्टियों में घर आई ...