बारिश अब तेज़ हो चुकी थी और उतनी ही तेज़ मीनाक्षी के दिल की धड़कने। वो लगातार ड्राइंग रूम से बालकनी के चक्कर लगाए जा रही थी, उसकी बेचैनी उसकी आंखों के साथ-साथ कदमों से भी साफ झलक रही थी। और ये बेचैन कदम तब रूके जब किचन से आ रही दूध के जलने की गंध मीनाक्षी की नाक तक पहुंची। वो दौड़कर किचन में गई और गैस की नॉब बंद करके उस पर चढ़ा चाय का पतीला नीचे उतारा, चाय के नाम पर अब सिर्फ जली हुई चायपत्ती ही बची थी।
उसी वक्त डोरबेल बजी तो मीनाक्षी सब कुछ वैसा ही छोड़कर दरवाज़ा खोलने चली गई। उसने दरवाज़ा खोला तो सामने समर्थ खड़ा था। सिर ने पैर तक भीगा हुआ, उसने अपने जूते वही बाहर उतारे और अंदर आ गया।
“मेरी पूरी बात सुने बिना तुम कहां चले गए थे?” मीनाक्षी ने अपने पति समर्थ के अंदर आते ही सवाल शुरू कर दिए। पर समर्थ बिना कुछ कहे सीधा बाथरूम में घुस गया। बेचैनी अब मीनाक्षी की आंखों से आंसू बनकर बहने लगी और ये आंसू उसे अपने साथ अतीत के उस किनारे तक ले गए जहां उसका एक ख्वाब टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर गया था।
“मेरी पूरी बात सुने बिना तुम कहां चले गए थे?” मीनाक्षी ने अपने पति समर्थ के अंदर आते ही सवाल शुरू कर दिए। पर समर्थ बिना कुछ कहे सीधा बाथरूम में घुस गया। बेचैनी अब मीनाक्षी की आंखों से आंसू बनकर बहने लगी और ये आंसू उसे अपने साथ अतीत के उस किनारे तक ले गए जहां उसका एक ख्वाब टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर गया था।
12 साल की रही होगी मीनाक्षी जब स्कूल में घुंघरूओं और कथक से उसकी पहली जान-पहचान हुई थी लेकिन ये जान-पहचान ज़्यादा लंबी नहीं चली, उसके पिता को जैसे ही उसके कथक सीखने का पता चला उन्होंने उसका स्कूल बदल दिया, और सख़्त हिदायत दी कि अगर उसने फिर से ये नाच-गाना सीखने की कोशिश की तो वो उसका स्कूल जाना ही बंद करवा देंगे। मीनाक्षी के पिता को लड़कियों के नाच-गाने से ऐतराज़ था, पर क्यों? इसकी वजह न तो उन्होंने कभी बताई और न ही मीनाक्षी ने पूछने की हिम्मत की। एक-दो बार मीनाक्षी ने अपने पिता को मनाने की कोशिश की लेकिन....
वक्त बीत गया। मीनाक्षी की समर्थ से शादी को भी दो साल हो गए। लेकिन कथक से लगाव मीनाक्षी के मन के एक कोने में आज भी ज़िंदा था और जब से उसे ये पता चला है कि उसके पड़ोस में एक डांस स्कूल खुला है उसका वो लगाव फुदक कर बाहर आ गया। मीनाक्षी ने सुबह जब समर्थ से कथक सीखने के बारे में बात की तब उसने कोई जवाब नहीं दिया। शाम को जब वो ऑफिस से लौटा तब मीनाक्षी ने एक बार और पूछा तो वो फिर से बिना कुछ कहे बाहर चला गया उसके बाहर जाते ही मीनाक्षी के मन में बेचैनी के बादल घिर आए और बाहर आसमान में घिरे बादल बरसने लगे।
अब मीनाक्षी को यकीन हो गया था कि पिता की तरह उसका पति भी न उसके मन को समझता है, न सपनों को। आंखों से टपकते आंसूओं को पोंछते हुए वो एक बार फिर अपनी ख्वाहिश को मन में दफन करने के लिए तैयार थी...तभी...पीछे से एक आवाज़ सुनाई दी...घुंघरूओं की आवाज़...मीनाक्षी ने पलटकर देखा तो समर्थ हाथ में घुघरूओं की एक जोड़ी लिए उसके पीछे खड़ा था।
“ये लो...अब इसके बिना कथक कैसे सीखती। वैसे तो सुबह ही सोचकर गया था कि शाम को ये घुंघरू लाकर तुम्हें सरप्राइज़ दूंगा पर भूल गया...इसीलिए अभी बिना तुम्हें बताए ये खरीदने चला गया था…सॉरी”
समर्थ बोले जा रहा था और मीनाक्षी ख़ामोश थी। घुंघरू उसके हाथों में थे लेकिन उनका संगीत उसके मन में गूंज रहा था और उस गूंज में उसके तमाम पूर्वाग्रहों का शोर शांत हो चुका था।
कोई तो मिला समझने वाला कोई तो मिला अपना सा।
ज़िन्दगी मेरी गुलज़ार हो गयी लगता है अब सपना सा...
ज़िन्दगी मेरी गुलज़ार हो गयी लगता है अब सपना सा...
No comments:
Post a Comment