Wednesday, February 14, 2018

वैलेंटाइन डे - Valentine Day

'पूरा दिन गुजर गया। न विश किया और न कोई गिफ्ट दिया।...आज वैलेंटाइन डे है, पर कोई फीलिंग नहीं, कोई कदर नहीं है इन्हें मेरे प्यार की।
हे राम! ये कैसा अनरोमांटिक पति दिया है मुझे? माथे पर हाथ रखते हुए कपड़ों की तह करते करते गुस्से से उन्हें झटकते हुए अपने पति को सुनाती हुई रीना बड़बड़ाने लगी। पर रंजन की निगाहें अब भी बस टी.वी. पर ही जमीं थीं।
कोई प्रतिक्रिया न होते देख और ज़ोर ज़ोर से बोलने लगी।
" वो स्नेहा है न! कितनी लकी है? उसका बॉयफ्रेंड हर महीने की एनीवर्सरी सेलिब्रेट करता है। कितना घुमाता फिराता है वो उसे।
एक ये हैं जो पति होकर भी मुझसे कोई अट्रैक्शन नहीं, कोई चार्म नहीं। बस नौकरी नौकरीं...की ही सुध है इन्हें तो।
मैं कुछ भी पहन लूं। कितना भी मेकअप कर लूँ। बिना देखे ही कह देते हैं। अच्छी लग रही हो। हुंहह....
"देखो डिअर! तुम जानती हो न? कि मुझे ये चोंचले बिल्कुल भी पसंद नहीं। रही प्यार की बात वो भी तुम जानती ही हो मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ।"
उसकी ठोड़ी पकड़ते हुए रंजन ने कहा।
'छोड़ो ये ड्रामा.....पूरा मूड ऑफ कर दिया मेरा।
प्यार जताने का एक भी तरीका नहीं आता तुम्हें तो।
पार्क में जा रही हूं। थोड़ा मूड फ्रेश करके आती हूँ।
यहाँ रहूंगी तो बस....
"ठीक है जाओ,पर जल्दी आना"
गुस्से में लगभग क़दम पटकती हुई घर के सामने वाले पार्क में जाकर वो एक बेंच पर बैठ गयी। तभी नज़र स्नेहा पर पड़ी। अरे ये....ये..ये रो क्यों रही है?
पास जाकर पूछा 'स्नेहा क्यों रो रही हो तुम?'
बताओ तो....उसके कंधे को लगभग झिंझोड़ते हुए रीना ने कहा।
दीदी....कह कर उसके सीने से लग कर हिचकियाँ ले लेकर रोने लगी वो।
वो वो मयंक कितना बड़ा चिटर है। पहले मेरे साथ वैलेंटाइन डे सेलिब्रेट किया फिर मैंने अब देखा वो दूसरी लड़की के साथ भी.....
क्या?
दिमाग घूम गया रीना का। उसे दिलासा देकर घर की तरफ कदम खुद ब खुद ही बढ़ गए।
कमरे में अंदर जाकर देखा तो कदम ठिठक गये कुछ आवाज़ें सुनकर।
"तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई यहाँ आने की? तुमसे किंतनी बार कह चुका हूं कि मैं शादीशुदा हूँ। अपनी बीवी से बहुत प्यार करता हूँ। फिर भी समझना ही नहीं चाहती कुछ।जाओ यहाँ से अभी के अभी।"
"पर सर मैं आपसे प्यार करती हूं। सुबह से आपके घर के बाहर इंतज़ार कर रही थी। आपके बाहर आने का फिर आपकी बीवी बाहर गयी। आज वैलेंटाइन डे है औऱ रविवार भी तो आफिस में आपको विश नहीं कर पाई। और आपसे मैंने ये कब कहा? कि आप मुझसे शादी करो। बिना शादी के भी तो आप मुझे खुश रख सकते हो न?"...
मुझे आप बहुत अच्छे लगते हैं। कहते हुए जैसे ही उसने रंजन के गाल को छूने के लिए हाथ आगे बढ़ाया। एक ज़ोर का थप्पड़ रंजन ने रसीद कर दिया उसके गाल पर। और वो गुस्से में बड़बड़ाती हुई निकल गयी। देख लूँगी.....ऐसा मज़ा चखाऊंगी कि याद रखोगे।
उनकी सारी बातें सुनकर मन में गहरा सन्तोष आ गया। अभी घर से जाते समय दिल में गुस्से की लहरें जो उफन उफन कर होठों से बाहर निकल रहीं थीं सब शांत हो गईं।
रंजन रीना को देख कर सकपका गया बोला अरे तुम कब आयी?
तुम रुको मैं बाज़ार से वेलेंटाइन गिफ्ट लाता हूँ तुम्हारे लिए। तुम तो जानती ही हो ये सब मुझे नहीं आता।
उसका हाथ अपनी हथेली में थाम मैं बोली" पर मेरा गिफ्ट मुझे मिल गया रंजन। सच्चा गिफ्ट।
वो...वो मैं तुम्हें बताने ही वाला था कि ये लड़की....
श..श....श...
कहकर उसके मुँह पर उँगली रख दी रीना ने।
और उसके सीने से लग गयी....

Tuesday, February 13, 2018

सुख - दुःख

एक बार एक सेठ ने पंडित जी को निमंत्रण दिया ।पर पंडित जी का एकादशी का व्रत था तो पंडित जी नहीं जा सके पर पंडित जी ने अपने दो शिष्यो को सेठ के यहाँ भोजन के लिए भेज दिया।
पर जब दोनों शिष्य वापस लौटे तो उनमे एक शिष्य दुखी और दूसरा प्रसन्न था!पंडित जी को देखकर आश्चर्य हुआ और पूछा बेटा क्यो दुखी हो -- क्या सेठ ने भोजन मे अंतर कर दिया ? "नहीं गुरु जी"
क्या सेठ ने आसन मे अंतर कर दिया ?
"
नहीं गुरु जी" , क्या सेठ ने दक्षिणा मे अंतर कर दिया ?
"
नहीं गुरु जी ,बराबर दक्षिणा दी 2 रुपये मुझे और 2 रुपये दूसरे को" अब तो गुरु जी को और भी आश्चर्य हुआ और पूछा फिर क्या कारण है ? जो तुम दुखी हो ?
तब दुखी चेला बोला गुरु जी मे तो सोचता था सेठ बहुत बड़ा आदमी है कम से कम 10 रुपये दक्षिणा देगा पर उसने 2 रुपये ही दिये, बस इसलिए !!
अब दूसरे से पूछा तुम क्यो प्रसन्न हो ? तो दूसरा बोला गुरु जी मे जानता था सेठ बहुत कंजूस है आठ आने से ज्यादा दक्षिणा नहीं देगा पर उसने 2 रुपए दे दिये तो मैं प्रसन्न हुआ...!

बस यही हमारे मन का हाल है संसार मे घटनाए समान रूप से घटती है पर कोई उन्हीं घटनाओ से सुख प्राप्त करता है कोई दुखी होता है ,पर असल मे दुख है सुख ये हमारे मन की स्थिति पर निर्भर है!
हमें अगर खुश रहना जाये तो हर हाल में खुश रहा जा सकता है। हमारी अपेक्षाएं/उम्मीदें हमारे दुःख का कारण है।

भेदभाव

एक विमान में एक गोरे अंग्रेज ने एकोनॉमी क्लास में सीट बुक कराई ! जब वो अपनी सीट के पास पहूचा तो देखा वहाँ उसकी बगल वाली सीट पर एक काली अफ्रीकन महिला बेठी थी ! उसे गुस्सा गया ! उसने विमान परिचारिका को बुलाया और गुस्से से कहा "मैं इस काली भद्दी और बुरी महिला के साथ बैठ कर यात्रा नहीं कर सकता मेरी सीट बदल दी जाये" !
परिचारिका ने विनम्रता से कहा "सर आज विमान में बहुत भीड़ है कोई सीट खाली नहीं है फिर भी में पॉयलेट से पूछ कर दूसरी सीट का इंतजाम करती हूँ ! तब तक आप अपनी सीट पर बैठिएे
परिचारिका वहाँ से चली गई ! थोड़ी देर बाद वह पुनः वहाँ आई और अंग्रेज से बोली "सर मेने पॉयलेट से बात की उन्होंने बताया कि आज एकोनॉमी क्लास में कोई सीट खाली नहीं है हां एक सीट फर्स्ट क्लास में खाली है हमारे सम्मानीय ग्राहक को बुरे लोगों के साथ सफ़र करने में कोई तकलीफ ना हो इस लिए उन्होंने वहाँ बैठने कि अनुमति दे दी है !
यह सुन कर अंग्रेज के चेहरे पर मुस्कान गई वो फर्स्ट क्लास में जाने के लिए ज्यो ही उठने लगा

परिचारिका ने उस काली अफ्रीकन महिला से विनम्रता से कहा " मेडम आप फर्स्ट क्लास कि उस सीट पर बैठिए ताकि आप को बुरे लोगों के साथ यात्रा करने कि तकलीफ ना उठानी पड़े "! अंग्रेज परिचारिका का मुह देखता रह गया। मित्रों, यह मात्र एक छोटी सी घटना है। पर एक छोटी सोच दर्शाती है और सिखाती है कि हमें रंग, वर्ण, आकार, जाति आदि के आधार पर किसी को निम्न या हेय दृष्टि से नही देखना चाहिए।

Packaged Food Vs Fresh Food | Think

पिछले दिनों Gurgoan जाना हुआ । वहां एक मित्र के घर रुका । उनकी छोटी बहन अमरीका में रहती हैं । छुट्टियों में घर आई ...