शिवा जी को रिटायर हुए एक वर्ष हो गया था। समय काटे नहीं कटता था। पत्नी तो युवावस्था में ही बेटे निहाल की जिम्मेदारी उनको सौंप कर चल बसी। शिवा जी ने दूसरा विवाह कर निहाल को सौतेली मां के आंचल में डालना स्वीकार नहीं किया और अकेले ही माता पिता दोनों का प्यार दिया तथा उच्च शिक्षा दिलवा कर निहाल को डाक्टर बनाया। अब बेटा बहू दोनों डॉक्टरी में व्यस्त हैं, फिर भी पिता जी की हर सुख सुविधा का पूरा ध्यान रखते हैं। शिवा जी अपनी दिनचर्या से ऊबने लगे। बहुत सोच विचार कर उन्होंने युवावस्था के अधूरे स्वप्न को पूरा करने का मन ही मन एक निश्चय किया और अपना प्रस्ताव बेटे के सामने रखा कि वे बस्ती के गरीब बच्चों को निःशुल्क शिक्षा देना चाहते हैं। पुत्र ने तुरंत उनकी बात का समर्थन किया और कोठी के पिछले हिस्से में सारी व्यवस्था करवा दी। शिवा जी ने शिक्षा केन्द्र का नाम पत्नी के नाम पर रखा "सरस्वती शिक्षा केन्द्र" समय शाम के पांच बजे से रात के आठ बजे तक । ताकि वे बच्चे भी लाभ उठा सकें जो दिन में परिवार की सहायता करते हैं और चाह कर भी शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाते। बस्ती में बच्चों की निःशुल्क शिक्षा केन्द्र की बात तेज़ी से फैलने लगी। धीरे धीरे बच्चों के साथ साथ बड़े लोगों ने भी आना शुरू कर दिया। घरों में रहने वाली बुज़ुर्ग महिलाओं ने भी लड़कियों को सिलाई कढ़ाई सिखाने का काम शुरू कर दिया। और फिर केन्द्र में सभी वृद्ध व युवा सुविधानुसार अपना समय तथा सहयोग देने लगे। सभी जगह शिवा जी नाम व काम की चर्चा होने लगी। उनकी प्रशंसा और सम्मान से प्रभावित होकर बेटे बहू ने भी निशुल्क वहां चिकित्सा शिविर का आयोजन किया। ऐसा करके उन्होंने जिस संतुष्टि का अनुभव किया वह उन्हें हर रोज हजारों रुपये कमाने से भी कभी नहीं मिली। शिवा जी का यह कदम सभी के लिए प्रेरणा बन गया कि वृद्ध एवं रिटायर लोगों को कभी लक्ष्य हीन होकर अपना जीवन नहीं जीना चाहिए बल्कि अपना समय उन कार्यों में लगाएं जो कभी उनका स्वप्न रहा हो, जिसे वे समय या साधन के अभाव में नहीं कर सके। शिवा जी ने अपनी सूझबूझ से अपना सपना भी पूरा किया और समाज में सहयोग एवं प्रेम के साथ साथ गरीबों के घरों में ज्ञान और सहयोग का दीप भी जलाया....
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