Tuesday, February 13, 2018

भेदभाव

एक विमान में एक गोरे अंग्रेज ने एकोनॉमी क्लास में सीट बुक कराई ! जब वो अपनी सीट के पास पहूचा तो देखा वहाँ उसकी बगल वाली सीट पर एक काली अफ्रीकन महिला बेठी थी ! उसे गुस्सा गया ! उसने विमान परिचारिका को बुलाया और गुस्से से कहा "मैं इस काली भद्दी और बुरी महिला के साथ बैठ कर यात्रा नहीं कर सकता मेरी सीट बदल दी जाये" !
परिचारिका ने विनम्रता से कहा "सर आज विमान में बहुत भीड़ है कोई सीट खाली नहीं है फिर भी में पॉयलेट से पूछ कर दूसरी सीट का इंतजाम करती हूँ ! तब तक आप अपनी सीट पर बैठिएे
परिचारिका वहाँ से चली गई ! थोड़ी देर बाद वह पुनः वहाँ आई और अंग्रेज से बोली "सर मेने पॉयलेट से बात की उन्होंने बताया कि आज एकोनॉमी क्लास में कोई सीट खाली नहीं है हां एक सीट फर्स्ट क्लास में खाली है हमारे सम्मानीय ग्राहक को बुरे लोगों के साथ सफ़र करने में कोई तकलीफ ना हो इस लिए उन्होंने वहाँ बैठने कि अनुमति दे दी है !
यह सुन कर अंग्रेज के चेहरे पर मुस्कान गई वो फर्स्ट क्लास में जाने के लिए ज्यो ही उठने लगा

परिचारिका ने उस काली अफ्रीकन महिला से विनम्रता से कहा " मेडम आप फर्स्ट क्लास कि उस सीट पर बैठिए ताकि आप को बुरे लोगों के साथ यात्रा करने कि तकलीफ ना उठानी पड़े "! अंग्रेज परिचारिका का मुह देखता रह गया। मित्रों, यह मात्र एक छोटी सी घटना है। पर एक छोटी सोच दर्शाती है और सिखाती है कि हमें रंग, वर्ण, आकार, जाति आदि के आधार पर किसी को निम्न या हेय दृष्टि से नही देखना चाहिए।

स्वप्न पूरा किया

शिवा जी को रिटायर हुए एक वर्ष हो गया था। समय काटे नहीं कटता था। पत्नी तो युवावस्था में ही बेटे निहाल की जिम्मेदारी उनको सौंप कर चल बसी। शिवा जी ने दूसरा विवाह कर निहाल को सौतेली मां के आंचल में डालना स्वीकार नहीं किया और अकेले ही माता पिता दोनों का प्यार दिया तथा उच्च शिक्षा दिलवा कर निहाल को डाक्टर बनाया। अब बेटा बहू दोनों डॉक्टरी में व्यस्त हैं, फिर भी पिता जी की हर सुख सुविधा का पूरा ध्यान रखते हैं। शिवा जी अपनी दिनचर्या से ऊबने लगे। बहुत सोच विचार कर उन्होंने युवावस्था के अधूरे स्वप्न को पूरा करने का मन ही मन एक निश्चय किया और अपना प्रस्ताव बेटे के सामने रखा कि वे बस्ती के गरीब बच्चों को निःशुल्क शिक्षा देना चाहते हैं। पुत्र ने तुरंत उनकी बात का समर्थन किया और कोठी के पिछले हिस्से में सारी व्यवस्था करवा दी। शिवा जी ने शिक्षा केन्द्र का नाम पत्नी के नाम पर रखा "सरस्वती शिक्षा केन्द्र" समय शाम के पांच बजे से रात के आठ बजे तक । ताकि वे बच्चे भी लाभ उठा सकें जो दिन में परिवार की सहायता करते हैं और चाह कर भी शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाते। बस्ती में बच्चों की निःशुल्क शिक्षा केन्द्र की बात तेज़ी से फैलने लगी। धीरे धीरे बच्चों के साथ साथ बड़े लोगों ने भी आना शुरू कर दिया। घरों में रहने वाली बुज़ुर्ग महिलाओं ने भी लड़कियों को सिलाई कढ़ाई सिखाने का काम शुरू कर दिया। और फिर केन्द्र में सभी वृद्ध व युवा सुविधानुसार अपना समय तथा सहयोग देने लगे। सभी जगह शिवा जी नाम व काम की चर्चा होने लगी। उनकी प्रशंसा और सम्मान से प्रभावित होकर बेटे बहू ने भी निशुल्क वहां चिकित्सा शिविर का आयोजन किया। ऐसा करके उन्होंने जिस संतुष्टि का अनुभव किया वह उन्हें हर रोज हजारों रुपये कमाने से भी कभी नहीं मिली। शिवा जी का यह कदम सभी के लिए प्रेरणा बन गया कि वृद्ध एवं रिटायर लोगों को कभी लक्ष्य हीन होकर अपना जीवन नहीं जीना चाहिए बल्कि अपना समय उन कार्यों में लगाएं जो कभी उनका स्वप्न रहा हो, जिसे वे समय या साधन के अभाव में नहीं कर सके। शिवा जी ने अपनी सूझबूझ से अपना सपना भी पूरा किया और समाज में सहयोग एवं प्रेम के साथ साथ गरीबों के घरों में ज्ञान और सहयोग का दीप भी जलाया....

Wednesday, February 7, 2018

झूठी महत्वाकांक्षा

पिता बेटे को डॉक्टर बनाना चाहता था। बेटा इतना मेधावी नहीं था कि PMT क्लियर कर लेता। इसलिए दलालों से MBBS की सीट खरीदने का जुगाड़ किया गया। जमीन, जायदाद जेवर गिरवी रख के 35 लाख रूपये दलालों को दिए, लेकिन वहाँ धोखा हो गया।
फिर किसी तरह विदेश में लड़के का एडमीशन कराया गया, वहाँ भी चल नहीं पाया। फेल होने लगा.. डिप्रेशन में रहने लगा। रक्षाबंधन पर घर आया और यहाँ फांसी लगा ली। 20 दिन बाद माँ बाप और बहन ने भी कीटनाशक खा के आत्म हत्या कर ली।
अपने बेटे को डॉक्टर बनाने की झूठी महत्वाकांक्षा ने पूरा परिवार लील लिया। माँ बाप अपने सपने, अपनी महत्वाकांक्षा अपने बच्चों से पूरी करना चाहते हैं ...
मैंने देखा कि कुछ माँ बाप अपने बच्चों को
Topper बनाने के लिए इतना ज़्यादा अनर्गल दबाव डालते हैं कि बच्चे का स्वाभाविक विकास ही रुक जाता है।
आधुनिक स्कूली शिक्षा बच्चे की Evaluation और Grading ऐसे करती है जैसे सेब के बाग़ में सेब की खेती की जाती है। पूरे देश के करोड़ों बच्चों को एक ही Syllabus पढ़ाया जा रहा है .......
For Example - जंगल में सभी पशुओं को एकत्र कर सबका इम्तहान लिया जा रहा है और पेड़ पर चढ़ने की क्षमता देख के Ranking निकाली जा रही है। यह शिक्षा व्यवस्था ये भूल जाती है कि इस प्रश्नपत्र में तो बेचारा हाथी का बच्चा फेल हो जाएगा और बन्दर First आ जाएगा।
अब पूरे जंगल में ये बात फ़ैल गयी कि कामयाब वो जो झट से कूद के पेड़ पर चढ़ जाए। बाकी सबका जीवन व्यर्थ है।
इसलिए उन सब जानवरों के, जिनके बच्चे कूद के झटपट पेड़ पर न चढ़ पाए, उनके लिए कोचिंग Institute खुल गए, व्हाँ पर बच्चों को पेड़ पर चढ़ना सिखाया जाता है। चल पड़े हाथी, जिराफ, शेर और सांड़, भैंसे और समंदर की सब मछलियाँ चल पड़ीं अपने बच्चों के साथ, Coaching institute की ओर ........ हमारा बिटवा भी पेड़ पर चढ़ेगा और हमारा नाम रोशन करेगा।
हाथी के घर लड़का हुआ .......
तो उसने उसे गोद में ले के कहा- 'हमरी जिन्दगी का एक ही मक़सद है कि हमार बिटवा पेड़ पर चढ़ेगा।' और जब बिटवा पेड़ पर नहीं चढ़ पाया, तो हाथी ने सपरिवार ख़ुदकुशी कर ली।
अपने बच्चे को पहचानिए। वो क्या है, ये जानिये। हाथी है या शेर ,चीता, लकडबग्घा , जिराफ ऊँट है या मछली , या फिर हंस , मोर या कोयल ? क्या पता वो चींटी ही हो ?
और यदि चींटी है आपका बच्चा, तो हताश निराश न हों। चींटी धरती का सबसे परिश्रमी जीव है और अपने खुद के वज़न की तुलना में एक हज़ार गुना ज्यादा वजन उठा सकती है।
इसलिए अपने बच्चों की क्षमता को परखें और जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करें..
हतोत्साहित नही...

Monday, January 15, 2018

| गले में घंटी का श्रृंगार ||

मैंने सुना है कि एक बहुत बड़ा तार्किक तेल खरीदने गया था तेली के घर। तेली का कोल्हू चल रहा था। बैल कोल्हू खींच रहा था, तेल निचुड़ रहा था। तार्किक था! उसने देखा यह काम, कोई हांक भी नहीं रहा है बैल को, वह अपने आप ही चल रहा है।
उसने पूछा, गजब, यह बैल अपने आप चल रहा है! कोई हांक भी नहीं रहा! रुक क्यों नहीं जाता? उस तेल वाले ने कहा, महानुभाव, जब कभी यह रुकता है, मैं उठकर इसको फिर हांक देता हूं। इसको पता नहीं चल पाता कि हांकने वाला पीछे मौजूद है या नहीं।
तार्किक-तार्किक था। उसने कहा, लेकिन तुम तो बैठे दुकान चला रहे हो, इसको दिखाई नहीं पड़ता? उस तेल वाले ने कहा, जरा गौर से देखें, इसकी आंखों पर पट्टियां बांधी हुई हैं। इसे दिखाई कुछ नहीं पड़ता। जब भी यह जरा ठहरा या रुका कि मैंने हांका। पर उस तार्किक ने कहा कि तुम तो पीठ किये बैठे हो उसकी तरफ। पीछे चल रहा है कोल्हू तुम्हें पता कैसे चलता है? उसने कहा, आप देखते नहीं बैल के गले में घंटी बांधी हुई है? जब तक बजती रहती है, मैं समझता हूं चल रहा है। जब रुक जाती है, उठकर मैं हांक देता हूं। इसको पता नहीं चल पाता। उस तार्किक ने कहा, अब एक सवाल और। क्या यह बैल खड़े होकर गर्दन नहीं हिला सकता है? उस तेल वाले ने कहा, जरा धीरे-धीरे बोलें। कहीं बैल न सुन ले।
तुम जरा अपनी जिंदगी तो गौर से देखो। न कोई हांक रहा है, मगर तुम चले जा रहे हो। आंख बंद है। गले में खुद ही घंटी बांध ली है। वह भी किसी और ने बांधी, ऐसा नहीं। हालांकि तुम कहते यही हो। पति कहता है, पत्नी ने बांध दी। चलना पड़ता है। बेटा कहता है, बाप ने बाध दी है। बाप कहता है, बच्चों ने बांध दी है। कौन किसके लिए घंटी बांध रहा है! कोई किसी के लिए नहीं बाध रहा है। बिना घंटी के तुम्हें ही अच्छा नहीं लगता। तुमने घंटी को श्रृंगार समझा है। आंख पर पट्टियां हैं, घंटी बंधी है, चले जा रहे हो। कहां पहुंचोगे? इतने दिन चले, कहां पहुंचे? मंजिल कुछ तो करीब आई होती....
ओशो

समझने वाला कोई तो मिला

बारिश अब तेज़ हो चुकी थी और उतनी ही तेज़ मीनाक्षी के दिल की धड़कने। वो लगातार ड्राइंग रूम से बालकनी के चक्कर लगाए जा रही थी, उसकी बेचैनी उसकी आंखों के साथ-साथ कदमों से भी साफ झलक रही थी। और ये बेचैन कदम तब रूके जब किचन से आ रही दूध के जलने की गंध मीनाक्षी की नाक तक पहुंची। वो दौड़कर किचन में गई और गैस की नॉब बंद करके उस पर चढ़ा चाय का पतीला नीचे उतारा, चाय के नाम पर अब सिर्फ जली हुई चायपत्ती ही बची थी।
उसी वक्त डोरबेल बजी तो मीनाक्षी सब कुछ वैसा ही छोड़कर दरवाज़ा खोलने चली गई। उसने दरवाज़ा खोला तो सामने समर्थ खड़ा था। सिर ने पैर तक भीगा हुआ, उसने अपने जूते वही बाहर उतारे और अंदर आ गया।
“मेरी पूरी बात सुने बिना तुम कहां चले गए थे?” मीनाक्षी ने अपने पति समर्थ के अंदर आते ही सवाल शुरू कर दिए। पर समर्थ बिना कुछ कहे सीधा बाथरूम में घुस गया। बेचैनी अब मीनाक्षी की आंखों से आंसू बनकर बहने लगी और ये आंसू उसे अपने साथ अतीत के उस किनारे तक ले गए जहां उसका एक ख्वाब टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर गया था।
12 साल की रही होगी मीनाक्षी जब स्कूल में घुंघरूओं और कथक से उसकी पहली जान-पहचान हुई थी लेकिन ये जान-पहचान ज़्यादा लंबी नहीं चली, उसके पिता को जैसे ही उसके कथक सीखने का पता चला उन्होंने उसका स्कूल बदल दिया, और सख़्त हिदायत दी कि अगर उसने फिर से ये नाच-गाना सीखने की कोशिश की तो वो उसका स्कूल जाना ही बंद करवा देंगे। मीनाक्षी के पिता को लड़कियों के नाच-गाने से ऐतराज़ था, पर क्यों? इसकी वजह न तो उन्होंने कभी बताई और न ही मीनाक्षी ने पूछने की हिम्मत की। एक-दो बार मीनाक्षी ने अपने पिता को मनाने की कोशिश की लेकिन....
वक्त बीत गया। मीनाक्षी की समर्थ से शादी को भी दो साल हो गए। लेकिन कथक से लगाव मीनाक्षी के मन के एक कोने में आज भी ज़िंदा था और जब से उसे ये पता चला है कि उसके पड़ोस में एक डांस स्कूल खुला है उसका वो लगाव फुदक कर बाहर आ गया। मीनाक्षी ने सुबह जब समर्थ से कथक सीखने के बारे में बात की तब उसने कोई जवाब नहीं दिया। शाम को जब वो ऑफिस से लौटा तब मीनाक्षी ने एक बार और पूछा तो वो फिर से बिना कुछ कहे बाहर चला गया उसके बाहर जाते ही मीनाक्षी के मन में बेचैनी के बादल घिर आए और बाहर आसमान में घिरे बादल बरसने लगे।
अब मीनाक्षी को यकीन हो गया था कि पिता की तरह उसका पति भी न उसके मन को समझता है, न सपनों को। आंखों से टपकते आंसूओं को पोंछते हुए वो एक बार फिर अपनी ख्वाहिश को मन में दफन करने के लिए तैयार थी...तभी...पीछे से एक आवाज़ सुनाई दी...घुंघरूओं की आवाज़...मीनाक्षी ने पलटकर देखा तो समर्थ हाथ में घुघरूओं की एक जोड़ी लिए उसके पीछे खड़ा था।
“ये लो...अब इसके बिना कथक कैसे सीखती। वैसे तो सुबह ही सोचकर गया था कि शाम को ये घुंघरू लाकर तुम्हें सरप्राइज़ दूंगा पर भूल गया...इसीलिए अभी बिना तुम्हें बताए ये खरीदने चला गया था…सॉरी”
समर्थ बोले जा रहा था और मीनाक्षी ख़ामोश थी। घुंघरू उसके हाथों में थे लेकिन उनका संगीत उसके मन में गूंज रहा था और उस गूंज में उसके तमाम पूर्वाग्रहों का शोर शांत हो चुका था।
कोई तो मिला समझने वाला कोई तो मिला अपना सा।
ज़िन्दगी मेरी गुलज़ार हो गयी लगता है अब सपना सा...

एक टूटा प्याला | Ek toota pyala

ड्राइंगरूम मे किसी चीज़ के टूटने की आवाज़ से रीतू दौड़ कर वहाँ पँहुची पर तब तक रोमा भाभी ने बंटी को एक थप्पड़ जड़ दिया था। माँ को देखते ही बंटी रोते हुए दौड़ कर माँ से चिपट गया। सामने ही कांच का गुलदान ज़मीन पर टुकड़ों मे पड़ा था जो शायद बंटी और राजू के खेलने में मेज़ से गिर गया था।
रोमा पहले तो ननद को देख कर सकपकाई फिर अपने बेटे राजू को जबरन घसीटते हुए बाहर ले जाने लगी। राजू भी रोया तो रीतू ने उसे संभालने की कोशिश की पर रोमा ने उसका हाथ झटक दिया......”रहने दीजिए… ये तो अब आए दिन हुआ करेगा”।
रीतू का दिल धक् से रह गया… भाभी की आवाज़ मे उतरा रूखापन उसे भीतर तक हिला गया..’अभी तो उसे मायके आए एक महीना भी नहीं हुआ… और अभी से…’
उसके ज़हन मे उस दिन का वाकया घूम गया जिस दिन वो यहाँ आई थी। बात छोटी सी थी पर किसी ने नहीं सोचा था कि कुछ ही देर में वह इतना तूल पकड़ लेगी।एक काँच का प्याला ही तो उसके हाथ से गिर कर टूटा था जिस पर उसके पति रवि ने कहा था...
“रीतू सम्भाल कर काम किया करो..यह टी सैट दीदी जापान से लाई थीं”, और वह बिफर उठी थी,
”तो क्या मैंने जानबूझकर तोड़ दिया” और फिर बात इतनी बढ़ी कि यहां तक नौबत आ गई कि रीतू ने अपना सूटकेस पैक कर लिया” मैं तुम्हारे साथ अब एक मिनिट भी और नहीं रह सकती”
“ठीक है, रोकता कौन है तुम्हें...” रवि का जबाब था।
घर पर माँ भाई ने कारण पूछा तो उसका एक ही जबाब था, “मैं उसके साथ नहीं रह सकती”
पर आज….उसका सर घूम गया…’एक प्याले की चटख से वह मायके आ गई पर अब….बंटी के गाल पर पड़ा थप्पड़ ...उसका दिल तड़प कर रह गया। माँ के कभी कहे शब्द उसके कानों में गूंज गए,’ भाई भाभी के घर मे ब्याही बेटी की गुज़र नहीं होती….अपना घर जैसा भी हो अपना ही होता है’ बेटे को कस कर सीने से लगाते हुए उसने रवि को फोन मिला दिया,”मैं घर आना चाहती हूँ”
“तुम्हारा घर है इसमें पूछना क्या।” रवि का जबाब था।
“मुझे माफ कर दो…गलती शायद मेरी ही थी” घर पंहुचते ही बिना किसी लागलपेट के उसने कहा तो रवि ने प्यार से उसके हाथ पकड़ लिए,”गलती मेरी भी थी...एक प्याला मेरे प्यार और परिवार से ज़्यादा तो नहीं था”
“फिर तुम मुझे लेने क्यों नहीं आए?”
“रीतू….तुम्हारे जाते ही मुझे अपनी गलती का अहसास हो गया था पर मैं चाहता था कि तुम्हें भी इस बात का अहसास हो ताकि भविष्य मे हम इतनी छोटी छोटी बातों को तूल न दें। हमारे प्यार से बड़ा कुछ भी नहीं है” रीतू के हाथों को चूम कर उसने बंटी को गोद मे उठा लिया।
एक प्याला टूट कर उन्हें बहुत कुछ सिखा गया था....

Packaged Food Vs Fresh Food | Think

पिछले दिनों Gurgoan जाना हुआ । वहां एक मित्र के घर रुका । उनकी छोटी बहन अमरीका में रहती हैं । छुट्टियों में घर आई ...